आसेका में अलचिकी की शताब्दी मनाई
आसेका की राउरकेला शाखा, नाहा तिरला गाँवटा और एएसईसीए जुवान गाँवटा ने संयुक्त रूप से 23 और 24 नवंबर को राउरकेला के सिविक सेंटर में अलचिकी की स्थापना की शताब्दी मनाने के लिए दो दिवसीय भव्य समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इसीक्रम में 23 नवंबर को सुबह 10 बजे सेक्टर 6 स्थित टेलीफोन भवन से सिविक सेंटर तक पारंपरिक नृत्य-संगीत के साथ एक जुलूस निकाला जाएगा। मुख्य अतिथि उदयनाथ माझी, सेवानिवृत्त आईआरएस, अलचिकी की स्थापना के शताब्दी सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। अतिथि वक्ता अलचिकी के प्रचार, प्रसार और समस्याओं से संबंधित विभिन्न विषयों पर अपने भाषण देंगे।
1905 की बैसाख पूर्णिमा को ओडिशा के मयूरभंज जिले में रायरंगपुर के निकट दंडबोस (दहारडीह) गांव में जन्मे पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1925 में संताली लिपि "अलचिकी" का निर्माण कर उसे जन-जन तक पहुंचाया। अलचिकी के माध्यम से शिक्षा के निरंतर प्रसार व प्रसार के कारण लोग अलचिकी में पढ़ने-लिखने लगे। अलचिकी के व्यापक उपयोग व सम्मान तथा इसकी आवश्यकता को देखते हुए केंद्र सरकार ने 22 दिसंबर 2003 को संताली भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया। यह अलचिकी लिपि ओडिशा के मयूरभंज, बालासोर, क्योंझर व सुंदरगढ़ के साथ-साथ झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, नेपाल व बांग्लादेश में भी प्रयोग की जाती है। अलचिकी के प्रचार, प्रसार व संताली साहित्य में उल्लेखनीय योगदान देने वालों को संस्था द्वारा सम्मानित किया जाएगा। दो दिवसीय सम्मेलन अलचिकी के माध्यम से शिक्षा के प्रसार पर केंद्रित होगा। इसके विस्तार, प्रगति और भविष्य पर चर्चा होगी। एएसईसी सदस्य श्री रमेश चंद्र पात्रा ने बताया कि ओडिशा और अन्य राज्यों से हज़ारों भाषा, साहित्य और संस्कृति प्रेमी इस सम्मेलन में शामिल होंगे।





